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II अपनी भाषा , अपना मंच II

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मुस्कानें

ये मुस्कानें किसी भी साधु के वैराग्य पर अनुराग छिड़क सकती हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ अगर राहुल जागकर मुस्कुराते हुए पिता को रोकते तो आज सिद्धार्थ तथागत नहीं होते। ये मुस्कानें किसी निर्मोही पर भी मोह… Continue Reading →

आवाज़ें

मैं बोना चाहता हूं आवाज़ें अपनी हर कविता में आवाज़ें जो सिर्फ अपनी सुनें जिन पर बस न चले किसी सांड जैसे शोर का जो खड़ी रहें मेरे साथ मेरे कंधे से लग कर धूप और छांव की परवाह किए… Continue Reading →

ज़िन्दगी

वो खड़ी है हर एक मोड़ पर, लेने नया एक इम्तिहाँ तत्पर हूँ मैं, प्रतिबद्ध भी करने को उसका सामना यूँ तो किसी के भाग का, ना छींन सकता ये जहाँ लेकिन मैं हूँ मुस्तैद, करना है हासिल जो लक़ीरों… Continue Reading →

ग़ज़ल

ख़ुदा ने तो सब्र आज़माया मेरा मगर तुमने क्यों दिल दुखाया मेरा छुपा कर हुआ मुझको ढ़हाने का काम सो मलबा भी अंदर गिराया मेरा हरेक शै थी अपनी जगह पे दुरुस्त हिसाब इश्क ने गड़बड़ाया मेरा ग़मों के थे… Continue Reading →

मिलो हम से

मिलो हम से किसी उगती हुई सुबह में या ढलती शाम में आकर चमकती रात के पिछले पहर किसी खामोश साअत में निगाहें सो रही हों जब समाअतें थक चुकी हों जब थके हारे हुए ख्वाबों की ताबीरें खिली हों… Continue Reading →

अच्छा आदमी

हमारे पैसे उन शराबों में गए जिनसे नशा नहीं हुआ मैं जब तुम्हारे शहर में आया बारिश का मौसम जा चुका था मेरी जेब से पैसे तब चुराए गए जब मैं तुम्हारे लिये तोहफा ख़रीदने जा रहा था मेरे अहबाब… Continue Reading →

दास्तान

दिन कट कट के गिरते हैं शाम के आँचल में सिर रख लम्हें सो जाते हैं रात एक नदी सी बहती है और हम दोनों अलग अलग किनारों से टूटे पुल पर चलते हैं आसमां का रंग लाल से काला… Continue Reading →

हम-तुम

कम से कम अब जिसे मिलेंगे हरे-भरे होंगे, ठीक हुआ जो अलग हो गए हम-तुम इस सावन। अगर बिछड़ते हम पतझड़ में कुछ भी न पाते। स्वप्न टूट सारे सूखे पत्तों से बिछ जाते। अपने हिस्से में आते, ये रूखे-रूखे… Continue Reading →

राग रामेश्वर

तुम उसका नाम पूछती हो कभी कभी रोज रोज और मैं चुप रहता हूं टाल देता हूं हमेशा हर रोज लेकिन मैं तुम्हें बताऊंगा कब? जब! जब सावन के बाद बागों में ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेंगे मोरपंख जब रंग… Continue Reading →

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