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II अपनी भाषा , अपना मंच II

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फर्क

छा जाती है बदली कभी मन की धरा पर और अगले ही पल ओझल हो जाती है बिन बरसे ही! धरा की बैचेनी तब बरसती है वेदना बनकर वहीं कहीं अपना मान लेने और अपनाने में बेहद फर्क होता है… Continue Reading →

वो लड़कियां

लड़कियों के दो घर होते हैं यह सब जानते हैं पर लड़कियां? पर लड़कियां जानती हैं घर का मर जाना जब वे कर लेती हैं प्रेम-विवाह प्रेम ईश्वर की नेमत है यह सब जानते हैं पर लड़कियां? पर लड़कियां जानती… Continue Reading →

सबक

यह शहर के बाहरी इलाके में बसी कॉलोनी का चाल था। तीन तरफ से एक के बाद एक बने बारह कमरे आगे की तरफ दीवार से लगे लोहे के दरवाजे से घिरे थे। बीच के बड़े से आँगन जैसी जगह… Continue Reading →

अधूरी सी मैं

मैंने कब मांगा अमरत्व तुमसे…… मैंने कब चाहा लफ़्ज़ों में ढालो मुझको और लिखो मनचाहा तुम ।। मैंने कब कहा कैनवस पर उकेरो मुझ को और भरो रंग अपनी मर्ज़ी के ।। मैंने कब चाहा तुम गीतों में ढालो मुझको… Continue Reading →

अप्रैल तुम फिर कभी मत आना

अपने कॉलेज के दिनों में मार्च के बाद गाँव से पटना आने पर बस से उतरते ही गला सूखने लगता था मैंने अप्रैल को कभी पसंद नहीं किया मैंने यही नापसंदगी कई राहगीरों के चेहरे पर देखी मैं अप्रैल से… Continue Reading →

बहार आ रही है

फ़िज़ा खुशनुमा है ज़मीं गा रही है, विदा कर खिज़ा को बहार आ रही हैं खेत में सरसों की बालियां सैकड़ों फिर, तिरी बाली क्यों मुझको याद आ रही हैं जानी पहचानी सी है ये बाद-ए-बहारा, भरके खुद में तेरी… Continue Reading →

सोच सेंगमेंट

यादों के मौसम में भावनाओं की नदी भी अतीत के खतरनाक स्तर से ऊपर ही बहने लगती है और तब तटबंध टूटने तय होते हैं शैल कुमुदिनी

मैं देखूंगा

मैं देखूंगा, ये जो छाती पीट रहे हैं ये जो हरदम चीख़ रहे हैं ये जो नफ़रत के सौदागर आग लगाना सीख रहे हैं आज से कुछ दिन बाद यहीं पर जब हर सू ख़ामोशी होगी जब मौतों पर रोने… Continue Reading →

रचो नई ऋचाएँ

रचो नई ऋचाएँ कर्म ही जहाँ जात हो पिछले जन्म का ना कोई पाप हो अपनाओ नई प्रतिबद्धताएं रचो नई ऋचाएँ बहुत हुआ मनुष्यता का संहार करो रूढ़ियों, बन्धनों का प्रतिकार करो शाश्वत परिवर्तन को स्वीकार शुद्ध करो दुर्गन्ध भरी… Continue Reading →

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