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II अपनी भाषा , अपना मंच II

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न्यू एंट्री

बाशिंदा

सवाल है, क्या पसंदीदा मुझमें जवाब, मेरा अहं शर्मिंदा मुझमें… बस्ता था मुझमें, वो कबका छोड़ गया रहता है कोई और बाशिन्दा मुझमें.. बंद है, तक़दीर के दरवाजे फिर भी ख्वाइशों का है, इक लम्बा पुलिंदा मुझमें.. यूं तो बे-असर… Continue Reading →

मांझी

हवाओं ने किया तूफान का इशारा है न साथ है मांझी न पास में किनारा है। बस कोई है जिसे अपना कह सकें वो महबूब नहीं, बस जीने का सहारा है। मैं कैद जुगनुओं को क्यों करूँ भला जब मेरी… Continue Reading →

काश

ख़ुद से बचकर निकल गए होते अपने दिन भी बदल गए होते हमको कोई कमी नहीं थी वहां हम अगर सर के बल गए होते ख़ुद से कुछ राबता रहा अपना वरना जड़ से उखड़ गए होते हम भी आवारगी… Continue Reading →

आज़ाद परिंदा

तू दुखी क्यों है? जो दुखी है तो रोती क्यों नहीं? इंसान है, भावनाएं हैं बह जाने दे क्यों समेट रही है खोल बाहों को तू परिंदा है खुद को कैद मत कर उड़ तो सही इस डाल से उस… Continue Reading →

मैं और मेरा मन

कुछ तो कर मेरे माज़ी कुछ तो बना मुझे, डाल दे वहशत में या पागल बना मुझे। बरसों हुए है आंख में ठहरा नही कोई, हो सके तो कोई मीर सा ख़्वाब दिखा मुझे। कितना उदास चेहरा! कितनी बेचैन निगाहें!… Continue Reading →

मां

गांव के पुराने मंदिर से घर के कुलदेवता तक पिछवाड़े के बूढ़े पीपल से आंगन की तुलसी तक पूजा के लिए सुबह-सुबह चुने जाने वाले अड़हुल और कनैल के ताजा फूलों में मंदिर की घंटियों और घरों से उठने वाली… Continue Reading →

माई

नज़र भर के फासले पर रखती है सब पर नज़र द्वार से ही टाल देती है आती सब बलाएँ लीपती है आँगन में सुखदा नम माटी होती है परेशान जरा सा छींक दे बिटवा रखती है ख़्याल मुनिया की ऊंच… Continue Reading →

चांद का जीना

भले ही अपने किसी प्रिय को इतराने या मन रखने के लिए चांद की उपमा दे देना वो अलग बात है, लेकिन आसान नहीं है चांद बनकर जीना वो भी दो पक्षों में शुक्ल पक्ष में बढ़ते-बढ़ते पूर्ण होकर पूर्णिमा… Continue Reading →

ग़ज़ल

इश्क़ में बे-करारी इस कदर रही है आग जितनी इधर उतनी उधर रही है । कोचिंग के बाद चाय का वादा था हँसते हँसते अब वो मुकर रही है । चाँद तो उसकी तस्वीरें लेने बैठा है पगली है कि… Continue Reading →

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