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काश

ख़ुद से बचकर निकल गए होते
अपने दिन भी बदल गए होते

हमको कोई कमी नहीं थी वहां
हम अगर सर के बल गए होते

ख़ुद से कुछ राबता रहा अपना
वरना जड़ से उखड़ गए होते

हम भी आवारगी में बच निकले
दुनियादारी में सड़ गए होते

गर न चलते यूं फ़ासले लेकर
सबको आदत से पड़ गए होते

रूह को जाने क्या तलाश रही
दिल तो कब के बहल गए होते

जाने किस आसमान में है ख़ुदा
हमसे मिलता तो लड़ गए होते

-ध्रुव गुप्त