यह शहर के बाहरी इलाके में बसी कॉलोनी का चाल था। तीन तरफ से एक के बाद एक बने बारह कमरे आगे की तरफ दीवार से लगे लोहे के दरवाजे से घिरे थे। बीच के बड़े से आँगन जैसी जगह में बीचो बीच खड़ा नीम इस चाल के टिकाऊ दोस्त की तरह था क्योंकि यहाँ रहने वाले परिवार तो कुछ महीनों या साल में इसे छोड़ जाते थे पर यह यहीं खड़े-खड़े इसका साथ देता और हर सुख-दुख का गवाह बनता रहता। यहाँ हर कमरे में ही कोई न कोई गरीब परिवार किराये पर रहते थे। सभी परिवारों के लिए मात्र दो साझे शौचालय और गुसलखाने थे। जहाँ सुबह अपनी बारी आने के लिए लाइन में लगना हर किसी की दिनचर्या का पहला काम होता। पर जैसा कि खुशहाली का अमीरी या गरीबी से कोई सीधा रिश्ता नहीं है, इस चाल के लोग अभावों में भी सुखी ही थे।
इसी चाल के एक कमरे में माया और उसका पति रमेश रहता था। पिछले पाँच साल से रह रहे माया और रमेश इस समय चाल के सबसे पुराने किरायेदार थे। इन दोनों का मिलनसार स्वभाव चाल के सभी परिवारों को भाता था। मकान मालकिन ने भी इसी वजह से उन्हें इतने समय से यहाँ रहने दिया था वरना तो वह दो साल से ज्यादा किसी को वहाँ टिकने न देती थी। कहती कि, ‘पुराने किरायेदार अपने आप को मकान मालिक समझने लगते हैं। पर माया और रमेश की बात अलग है। इनका सरल सहज स्वभाव मुझे पसंद है।’ माया का चाल में रहने वाली अन्य औरतों से भी बहनों सा रिश्ता था। पर उसके निजी जिंदगी में एक फास था जो उसे रह रहके दर्द देता था। ब्याह कर आये दस बरस हो चुके थे और उसकी गोद सूनी ही थी। गाँव से सास ससुर और बाकी लोगों का रमेश पर दूसरी शादी के लिये बहुत दबाव था। रमेश ने कभी खुलकर खुद तो कुछ न कहा पर जबसे चाल में सोना और उसकी बूढ़ी माँ रहने आईं थीं वह धीरे धीरे रंग बदलने लगा था।
दरअसल सोना की बहन रूपा और जीजा नन्हे पहले से ही यहाँ रहते थे। रूपा जबसे गर्भवती हुई थी तभी से नन्हे के पीछे पड़ी हुई थी कि इसी शहर में दूसरी जगह किराये पर रह रही उसकी बूढ़ी माँ और बहन को यहीं रहने को बुला ले। इससे जहाँ खुद उसे इस समय में काम करने से मुक्ति मिल जाती वहीं बेसहारा बहन और माँ को भी कुछ सहारा मिल जाता। ‘आखिर जमाने में आग लगी हुई है। एक बूढ़ी के साथ रह रही जवान बेटी को आसपास के मनचले अपने लिए खुला न्यौता मानते हैं। माँ भी कम तक मजदूरी करती रहेगी.. पर एक कमरे के घर में उन्हें कैसे साथ रखेंगे’ यही सब सोचकर रूपा नन्हे पर ज्यादा जोर न चला पाती। संयोग से इसी बीच चाल का एक परिवार कमरा खाली कर गाँव चला गया। रूपा की तो मुराद पूरी हो गई। उसने नन्हे को राजी कर लिया। दो तीन दिन के अंदर ही सोना और उसकी माँ ने उस कमरे में नये किरायेदार के रूप में डेरा जमा लिया।
सोना अभी अठारह की हुई थी। वह अपने नाम की तरह ही दिखती थी। उसके साँवले और कसे बदन, सुन्दर नैन नक्श साथ ही हरदम चहकते रहने वाले स्वभाव ने जल्दी ही चाल में उसे सबकी नजर में ला दिया। जवान जहाँ उसे नजरें छुपा कर देखते वहीं नव ब्याहता औरतें रश्क खातीं। कस्तूरी लिये हिरनी की भांति वह चाल को अपनी महक से मदहोश किये जा रही थी। नन्हे अपनी सास और साली का खूब ख्याल रखता। कुछ दिन के अंदर ही वह उनके लिये नये कपड़े, घरेलू प्रयोग के समान सब खरीद लाया। बूढ़ी सास उसे आशीर्वाद देते न थकती। कहती ‘नन्हे मेरा दामाद नहीं बेटा है। इस बुढ़ापे में अब फैक्ट्री में काम न होता था। अब बस सोना के हाथ पीले हो जायें। मेरी जिंदगी तो समझो कट ही गई।’
रमेश सुबह-सुबह ही रेहड़ी लेकर गली गली सब्जी बेचने निकलता। दोपहर में घर आकर आराम करता, शाम को मंडी जाकर ताजी सब्जियां लाता और फिर रोज रात को अलग-अलग साप्ताहिक बाजारों में रेहड़ी लगाता। माया कमरे की साफ सफाई करने, खाना बनाने जैसे सभी घरेलू काम करती और फिर रेहड़ी पर करीने से सब्जियां लगवाती। समय मिलने पर चाल की औरतों से गप्पे मारती। यही दिनचर्या थी उसकी। पर इधर एक-आध औरतों ने जबसे उसके कान भरे कि ‘रमेश सोना को चुपके चुपके निहारता है और सोना भी उसे देखकर मुस्कुराती है’ उसका मन खिन्न हो गया। वह खुद नजर रखने लगी और उसे भी ऐसा ही आभास हुआ। उसने घुमा फिराकर सोना की माँ से उसका ब्याह करा देने की बात कही। रमेश को भी जब तब उसकी पोल पट्टी पता होने की बात कहकर लताड़ा। पर कोई असर होता हुआ दिखाई न दिया।
इसी बीच गाँव से माया के सास ससुर शहर घूमने के मकसद से एक महीने के लिये आकर यहीं जम गये। कमरा एक ही था सो दिन में ज्यादातर समय वे नीम के नीचे आग जलाकर हाथ सेकते हुए बैठे रहते या बाहर ही खाट बिछा धूप का आनंद लेते। माया की सास और सोना की माँ दोनों हमउम्र थीं। वे घंटों एक साथ धूप में बैठी बातें करतीं। सोना की माँ जहाँ जवान बेटी के ब्याह और अपने बेसहारा-गरीब होने की बात कहकर चिंतित हो जाती वहीं सोना की सास अलग ही सुर छेड़ती और कहती, ‘अब तक पोते-पोतियों का मुँह न दिखाया भगवान ने। इस माया मनहूसी से एक बच्चा न दिया गया घर खानदान के लिये।’ सोना के माँ की स्थिति को समझते हुये उस पर डोरे डालने के लिये एक दिन माया की सास ने ऐसे ही बात उछाली ‘लड़की मिले तो मैं फ्री में रमेश का दूसरा ब्याह करा दूँ। इस माया को तो गाँव में कर देते, हमारी सेवा पानी करती। नयी बहू के साथ रमेश यहाँ रहता।.. राज करेगी ऐसी लड़की, आखिर कोई कमी नहीं है हमारे रमेश को। अच्छा कमा लेता है। यहीं एक कमरे में रह रहे हैं वरना तो गाँव में चार कमरों का घर, दो भाइयों पर दस बीघा जमीन, ट्रैक्टर, बाइक सब है।’
ये बात पूरी निशाने पर लगी थी। सोना की माँ को ये रिश्ता सोना के लिये जम रहा था। ‘क्या हुआ अगर सोना अठारह की और रमेश अट्ठाईस का है। आखिर मरद जात है बड़ा ही होना चाहिये। कहाँ ढूँढती फिरूँगी रिश्ता, फिर कौन ब्याहेगा गरीब की बेटी मुफ्त में।’ ऐसा सोचते हुए उसने माया की सास से खुलकर बात छेड़ दी। दोनों ने आपस में हामी भर ली। पर तूफान आना तो अभी बाकी था।
पूरे चाल में अंदर ही अंदर बात ऐसे गूँजने लगी जैसे कोई बहुत बड़ा रहस्य लोगों को पता चल गया हो पर साथ ही किसी एक से इसे उन्हें छिपाना भी हो। औरतें आपस में फुसफुसातीं.. ‘हमें तो पहले से ही पता था। जबसे ये माँ बेटी आईं हैं तभी से इनकी नीयत ठीक न लग रही थी। बेचारी सीधी सादी माया ही मिली थी इन डायनों को।’ पुरुष औरतों को झिड़कते.. ‘चुप रहो। दूसरे के घर के मामले में काहे टाँग अड़ाना।’ अक्सर खुद से जुड़ी बात सबसे बाद में पता चलती है। माया को खबर तभी लगी जब सास ने ससुर और बेटे की उपस्थिति में दूसरी शादी की चर्चा छेड़ी। माया को धक्का तो लगा पर उसने इस उम्मीद से रमेश की ओर देखा कि वही इस बात पर बिदक जाएगा। पर रमेश की तो जैसे मन की बात पूरी हो रही हो। तिरछी मुस्कान बिखेरते और शर्माते हुए उसने कहा ‘अम्मा और बाबूजी जैसा आपको ठीक लगे करो।’ माया ठगी सी रह गई । ‘जिस पति के लिए मैं दस सालों से तन मन से समर्पित रही, सुख- दुख सब साथ झेला वह बिना उसके बारे में सोचे कैसे हाँ कर सकता है।’ माया अब चुप नहीं रह सकती थी।
उसने कमरे से बाहर आकर सोना के लिए गन्दी गालियाँ निकालते हुए दहाड़ना शुरू किया, ‘इस बेहया को मैं पहले दिन ही समझ गयी थी। ये और इसकी चुड़ैल माँ तभी से मेरे घर परिवार पर दाँत गड़ाये बैठी हैं। अरे इतनी ही जवानी नहीं संभल रही तो करमजली जा रोड पर खड़ी हो जा…बहुत मिलेंगे। मेरा घर बक्श।’ चाल के सभी परिवार कमरों से बाहर निकलकर चाल के बीच खड़े नीम के नीचे आ जमे।
माया दहाड़े जा रही थी। औरतें उसे देखकर सहमति में सिर हिलातीं तो मर्द कहते ‘चलो कोई बात नहीं घर का मामला घर में सुलझा लो।’ पर अब रमेश की माँ भी यह सोचकर कि बात खुल ही रही है तो रंग में आ गई। बोली, ‘अरे करमजली, मनहूसी दस बरस में हमारे रमेश का वंश बेल तो बढ़ा न सकी और बकवास करती है। जबसे आई है तूने हमें दियो ही क्या है? कलंकिनी तेरे आने के हफ्ते भर में मेरे छोटे का एक्सीडेंट भयो और चल बसो। तू मनहूसी है मनहूसी। अब देखती हूँ रमेश का दूसरा ब्याह कौन रोके है। बुला ले अपने विधवा माँ को। सबको बताऊंगी कि तू हिजड़ी है। बच्चा न जन सके।’ माया ने रोते हुए कुछ कहना चाहा कि रमेश ने तरेरते हुए उसे कमरे के अंदर खींचकर दरवाजा बंद कर दिया। काफी देर तक रोने की आवाज बाहर आती रही। उसकी सास बाहर ही अपने फैसले को सही बताते हुए अपना पक्ष लोगों को समझाती रही। सोना और उसकी माँ अंदर ही दुबकी रहीं जैसे साँस भी न ले रही हों।
अब तो रमेश और सोना की शादी की बात खुलेआम चलने लगी। तारीख तय हुई, जरूरी तैयारियां सब फटाफट पूरी होने लगीं। इस बीच खबर मिलने पर माया की माँ जरूर समझाने के लिए गाँव से आई। रोई- गिड़गिड़ाई पर रमेश और उसके घर वालों पर कोई असर न हुआ। उलटे उसे धमकाकर चुप करा दिया गया कि माँ बेटी चुपचाप इस फैसले को मान लें नहीं तो माया को पीहर की रोटी ही तोड़नी पड़ेगी। बूढ़ी माँ बेटी को भाग्य का लेखा मानने और सबकुछ भगवान पर छोड़ देने की सीख देकर वापस चली गई।
इधर शादी को खरीद फरोख्त होती, सोना के लिये कपड़े, गहने खरीदे जाते उधर माया की उदासी बढ़ती जाती। रमेश तो पूरा बदल चुका था। जब सब्जियां बेचने नहीं जाता तब कमरे के बजाय बाहर नीम के नीचे आग जलाये बैठा रहता। माया को तो जैसे पहचानता ही नहीं। सोना को चुपके चुपके ताडता, नजरें मिलने पर मुस्कुराता। उसकी मुस्कान खत्म भी न होने पाती कि कोई न कोई माया को इशारा करके इसकी खबर दे देता। दो चार बार तो उसने रमेश को धिक्कारा पर अब वह कुछ न बोलती, सिर्फ उसकी आँखे भर आतीं और अपने भाग्य को कोसती। शादी में पाँच दिन बचे थे। रमेश ने माया को गाँव चलने और वहीं ससुराल में रहने का फरमान जारी कर दिया। दो घंटे में तैयार होने को कहकर कहीं चला गया। माया रोते हुए सामान बाँधने लगी। चाल में खबर मिलते ही कुछ औरतें उससे मिलने आने लगीं और दिलासा देने लगीं। जिन्हें खबर नहीं मिली उनसे माया खुद जा जाकर मिल रही थी। बस रूपा और सोना के कमरे की ओर वह नहीं गयी।
रमेश माया को गाँव करके दो दिन में ही लौट आया। मंदिर में धूमधाम से शादी हो गयी। दुल्हन बनी, सजी- संवरी सोना किसी अप्सरा सी दिखती। खनकती चूड़ियों, बजती पायल, सितारों वाली साड़ी और महकते इत्र के साथ वह सारे चाल को अपने होने से अभिभूत किये जा रही थी। रमेश भी अठारह बरस के बाँकुरे प्रेमी सा उसके आगे पीछे उसकी परवाह किये घूमता रहता। शादी के दो दिन बाद ही माँ बाप को उसने गाँव भेज दिया था मानो वे उसकी नयी जिंदगी का आनंद लेने में बाधक हो। आखिर एक ही कमरा था दिक्कत तो थी ही । वह सब्जी बेचने बहुत थोड़े समय के लिये जाता, ज्यादा समय कमरे में ही बंद रहता। अब दोनों आजाद पंछी के जोड़े की तरह उन्मुक्त हो खुले आकाश में उड़ रहे थे। काम से जल्दी वापस आकर रमेश सोना को लेकर बाजार भी घूमने जाता। मिठाई, आइसक्रीम और मनपसंद चीजें सोना को खिलाता। यहाँ तक की जीवन में पहली बार सिनेमा के मंहगे टिकट खरीदकर उसने सोना को फिल्म भी दिखाया।
लेकिन सीमित कमाई में यह सब कब तक चलता। इससे पहले की पैसे कि तंगी ज्यादा बढ़ जाये रमेश सचेत होने लगा। शादी के एक डेढ़ महीने बाद वह अब खर्च में सावधानी बरतने लगा। कभी-कभी याद करता कि कैसे माया उसे बिल्कुल भी फालतू खर्च न करने देती थी। पाई पाई जोड़कर पैसे बचाती थी। पर क्या फायदा? ज्यादातर बचाया हुआ पैसा शादी ब्याह के खर्चे और खरीददारी में चला गया। सोना का खुद का खर्चा इतना ज्यादा था ही ऊपर से वो अपनी माँ और बहन पर भी दिल खोलकर लुटाती। रमेश को अब उसकी इन आदतों पर कोफ्त होने लगी। एक दिन उसने गुस्से में इसके लिये सोना को झिड़का भी। मगर सोना तुरंत माँ को शिकायत कर आई। सासू माँ ने आकर तुरंत ताना मारा, ‘फूल सी बच्ची तुम्हें दुख सहने के लिए नहीं दी है। अपनी उम्र देखो और उसकी।.. आइंदा मेरी बिटिया को दुख मत देना। तुम्हारा बंश यही बढायेगी।’ रमेश कुढ कर रह गया। उसने सोचा ‘कितना फर्क है सोना और माया में।’ इधर चाल में औरों को भी सोना का व्यवहार खटकने लगा था। छोटे बच्चों को छोटी गलती पर भी जब तब बुरी तरह डांट देना, बड़ी उम्र के मर्दों के सामने भी उसका इज्ज़त से पेश न आना, लंबी लंबी छोड़ना, खुद के खर्चे को दूसरों के सामने जानबूझकर दिखाना और जताना औरतों को बिल्कुल न भाता। वे आपस में बतियातीं ‘एक माया थी और एक ये। बस चाम देख लो काम कुछ नहीं। रमेश को तो ऐसे ये दीमक की तरह चाट जायेगी। पर वो तो इसके चक्कर में आँखों पर पट्टी बाँधे बैठा है।’ उनमें से तो कुछ ने मौका देखकर रमेश से माया की बात छेड़कर सोना की उससे तुलना कर डाली। पर रमेश इसका कोई जवाब न देता।
इस बीच घटी एक घटना ने रमेश की जिंदगी में नया भूचाल ला दिया। अभी उसकी दूसरी शादी हुये चार महीना ही हुआ था। सोना की बहन रूपा गर्भावस्था के अंतिम दिनों में सुरक्षित प्रसव की उम्मीद से पति के साथ गाँव गयी थी। ऐसा करने के लिये सास यानि नन्हे की माँ का बहुत दबाव था। वह कहती कि, ‘हमारे घर के सभी बच्चे यहीं गाँव में पैदा हुए हैं।.. मैं अच्छे से देख रेख करूँगी। मैंने चार बच्चे जने हैं। वो तो भगवान की मर्जी नहीं थी। बड़े होकर भी तीन उन्हीं के प्यारे हो गये।..पर अपने नन्हे की औलाद अपनी आँखों के सामने जनवाऊंगी।’ हुआ भी सब ठीक ठाक। रूपा ने स्वस्थ लड़के को जन्म दिया। प्रसव के बीस पचीस दिन बाद वह पति और बेटे के साथ शहर आने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँची। पर ट्रेन पकड़ने के लिए वे रेल की पटरी को पार कर ही रहे थे कि तभी ट्रेन आ गयी। पति नन्हे तो दौड़कर उस पार हो गया पर गोद में बच्चा लिये रूपा उसकी चपेट में आ गयी। न जाने कैसे बच्चा हाथ से छूटा और पटरी की दूसरी ओर जा गिरा। चमत्कार ही था कि तौलिये में लिपटे बालक को खरोंच तक न आई। पर रूपा संसार से विदा हो गयी। गाँव से लेकर शहर तक कोहराम मच गया। सोना भी माँ को लिये नन्हे के गाँव उसके घर दुख में शामिल होने पहुँची। आखिर बहन और जीजा से ज्यादा करीबी रिश्ता क्या होगा? रमेश तो न गया पर उसने सोना को जाने से रोका नहीं।
सोना लगभग एक महीने नन्हे के घर ही रही जब तक कि रूपा की मृत्यु उपरांत के सारे क्रियाकर्म पूरे न हो गये। रूपा का बच्चा मौसी सोना को ही माँ समझ उससे चिपका रहता। सोना भी उस पर पूरी ममता दिखाते हुये बोतल से दूध पिलाती, मालिश करती, नहलाती- धुलाती, खेलाती और सुलाती। जो देखता वही कहता कि ‘इस नन्ही जान को तुमने बहुत अच्छे से संभाला है, भगवान तुम्हारा भला करेगा।’ तन्हा नन्हे यह देखकर कुछ सकून पाता कि चलो बिन माँ के बच्चे को कोई तो संभाल सकता है। न जाने कब, क्यों और कैसे सोना उसे भाने लगी। एक दिन चढ़ते अंधेरे में मौका पाकर उसने सोना का हाथ पकड़ लिया।
‘सोना न जाने क्यों तुममें मुझे रूपा दिखाई देती है। मेरा मुन्ना भी तो तुम्हें माँ की तरह ही देखता है।…मैं रमेश से कम तो नहीं कमाता। तुम्हें बहुत खुश रखूँगा। वो नपुसंक रमेश…जो पहली से न बच्चा जन सका वो जरूरी नहीं कि तुमसे..।’ नन्हे बोले जा रहा था। सोना ने जाने क्यों न तो उसकी बातों का विरोध किया और न ही उसे बोलने से रोका। किसी के आने की आहट भांप वो हाथ छुडाकर अंदर चली गई। मुन्ने के साथ बिस्तर पर रात भर नन्हे की बातें उसके कानों में गूंजती रहीं।
रमेश फोन पर सोना को वापस आने के लिये दबाव बढ़ा रहा था। आखिर सब काम भी खत्म हो चुका था। अब और रुकने का न तो कोई तुक था न ही कोई बहाना। सोना की माँ ने समधी- समधन से वापस जाने की अनुमति माँगी। नन्हे की माँ फफक पड़ी। बोली ‘हाय हमारे मुन्ना का अब क्या होगा? कौन संभालेगा उसे? इस उम्र में मुझ बूढ़ी से तो बच्चा न पाला जायेगा। ये तो सोना के हिये भी बहुत लग गया है। हे राम इसका क्या होगा?’ बात तो सही ही थी। पर तभी सोना बोल पड़ी ‘चाची चिंता न करो। हम मुन्ने को साथ ले जायेंगे। मैं कौन सा बाल बच्चों वाली हूँ। इसकी देखभाल कर लूंगी। फिर हमारे कमरे तो पास पास हैं। सुबह शाम जीजा के पास चला जाएगा तो बाप का प्यार भी पा जायेगा।’ बात सभी को जमी खासकर नन्हे को। इसमें वो अपने बेटे और अपना दोनों का भला देख रहा था। दो दिन बाद नन्हे अपने मुन्ने, सोना और सास के साथ शहर आ गया।
शहर लौटकर सोना दिनभर मुन्ने के साथ लगी रहती। उसे मुन्ने का ध्यान रखने के आगे रमेश या उसके जरूरतों का ध्यान न रहता। रमेश कुछ दिन में ही इस सब से परेशान हो गया। खासकर मुन्ने को देखने, उसे प्यार करने, हाल चाल पूछने के बहाने दिन में कई बार नन्हे का कमरे तक आना जाना उसे कतई न सुहाता। वह तब और सुलग जाता जब सोना मुन्ने को लेकर नन्हे के कमरे में जाती। जितनी देर उसके कमरे में रहती वह तड़पता रहता। सोना का नन्हे से इस तरह मिलना, मुन्ने के साथ उसके कमरे में आना जाना और रुकना धीरे-धीरे चाल की औरतों और मर्दों की नजर में आने लगा। माया से सहानुभूति रखने वाली एक औरत ने तो एक दिन रमेश को सुखाने के लिये रस्सी पर कपड़े डालते हुये देख इशारे इशारे में कह ही दिया, ‘क्या रमेश आजकल तो सब्जी बेचने के साथ-साथ घर के काम भी करने पड़ रहे हैं न। अब सोना को भी तो मुन्ने और नन्हे दोनों का ख्याल रखना होता है। तुम्हें समय न दे पाती होगी।…मैं कह रही थी कि… माया को ही लिवा लाते।’ अंतिम पंक्ति तो शायद रमेश को सुनाई ही न दी। बस कान में यही गूंजता रहा कि ‘अब सोना को मुन्ने और नन्हे दोनों का ख्याल रखना पड़ता है।’ वह अंदर ही अंदर जैसे गलने लगा। वह सोना से स्पष्ट बात कर लेना चाहता था और कह देना चाहता था कि ‘तुम पूरी तरह मेरी हो। नन्हे नाम की बला को मैं नहीं झेल सकता।’ पर वह ये बात कहे कैसे ? उस समय कुछ न कहकर रेहड़ी लिये वह सब्जी बेचने निकल गया।
शाम लौटा तो कमरे पर सोना नहीं थी। उसने तुरंत नन्हे के कमरे की तरफ देखा। सोना मुन्ने को लिये नन्हे के कमरे से निकलते हुए दिखी। पास आकर सोना बोली ‘आज इसके पापा काम पर नहीं गये तो उन्हीं के पास दो घंटे से खेल रहा था। अब लेकर आई हूँ।…’ सोना की बात पता नहीं पूरी हुई थी कि नहीं पर रमेश की आँखें लाल हो चुकी थीं। वह इतना सुनकर ही तमतमाने लगा था। बोला ‘अपने बाप के पास था किसी गैर के पास नहीं। तुम इन बाप बेटे के चक्कर में ज्यादा मत रहो। अपना घर देखो..मैंने तुमसे शादी नन्हे का घर संभालने के लिये नहीं अपना घर संवारने के लिए की है।’ अनायास ही रमेश की मुँह से ऐसी जली कटी सुन सोना को भी गुस्सा आ गया। उससे आज तक किसी ने ऐसे बात नहीं की थी। तमक कर बोली, ‘जो कहना है साफ साफ बोलो। इस नन्हीं जान को इन सबमें मत लपेटो। एक बच्चे के लिये ही तुमने भी मुझसे शादी की है। बच्चे से जलन…छी। खुद तो पैदा कर नहीं सके और दूसरों से जलन..।’ इस बात ने तो रमेश के बदन में आग लगा दी। पुरुषत्व पर हुए इस हमले से वह खुद को संभाल न पाया। उसने सोना के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया। सोना भी कहाँ कम पड़ने वाली थी। उसने जोर जोर से रोते हुए अपनी माँ और नन्हे को आवाज लगाई ‘ अरे अम्मा.. अरे जीजा.. बचाओ इस पापी से मुझे। इसने मुझे थप्पड़ मारा। अब मैं इसके साथ न रहूँगी।’ नन्हे और सोना की माँ फटाफट अपने कमरों से भागते हुए बिजली की तेजी से वहाँ पहुँच सोना को संभालते हुए तफ्तीश करने लगे। रमेश को लगा कि उससे गलती हो गई है। इसलिए वहाँ से हटने में ही भलाई समझी।
वह चलते हुए बाजार की ओर निकल आया। धीरे-धीरे उसका गुस्सा खत्म होता गया और खुद को कोसने लगा …”मैंने बिना किसी बात के उस पर शक किया।…ऐसा भी तो हो सकता है कि ऐसा कुछ हो ही न जैसा मैं सोच रहा हूँ। किसी औरत के चरित्र पर सवाल उठाऊँगा तो पलटकर वो कुछ तो कहेगी ही…पर उसने भी मुझे कितनी बड़ी बात कही।…ऐसे कोई कहता है।’ खैर रमेश ने बात खत्म करने के इरादे से सोना की मनपसंद बर्फी खरीदी और चाल की ओर चल पड़ा।
कमरे में घुसा तो कमरा कुछ अस्त व्यस्त लगा। जैसे किसी ने जानबूझकर सामान पलटा हो। कमरे के अंदर बाहर देखा सोना दिखाई नहीं दी। उसने उसका नाम लेकर पुकारा। सोना तो नहीं आई पर उसकी माँ जरूर कमरे के सामने आकर बोली। ‘अरे नासेपिटे, सोना को क्यों बुलाता है? मुझसे बात कर। तेरी माँ के कहने में आकर अपनी फूल जैसी बच्ची तुझे दी थी कि तेरी पौध बढ़ जाये…पर तू निपूता ही रहेगा। मेरी लाडो पर हाथ उठाता है। अब रह ऐसे ही।’
अब तक नन्हे भी वहाँ आ चुका था। वह भी गुर्राते हूये बोला, ‘रमेश तूने आज बड़ा गलत काम किया। अगर सोना तेरी शिकायत कर दे तो जेल भी जायेगा। आजकल सारे कानून जनानियों के पक्ष में हैं। …अब सोना तेरे पास न रहेगी भाई। हमने मिलकर फैसला कर लिया है। वह मेरे साथ रहेगी, मेरे मुन्ने की माँ बनकर।’ अब तक चुपचाप सब सुन रहा रमेश ये सुनकर बिफर पड़ा, ‘ऐसे कैसे तेरे साथ रहेगी? शादी हुई है मेरे साथ। कोई तमाशा थोड़ी चल रहा है।’
नन्हे तुरंत बोला, ‘शादी तो तेरी माया के साथ भी हुई है भाया और मैंने सब पता कर लिया है वकील बाबू से.. एक हिन्दू पत्नी के रहते दूसरी शादी न कर सकता। गैरकानूनी है ये। तुझपे तो कई केस बनेंगे, क्या समझा।’ रमेश समझ गया कि नन्हे न केवल पूरी तरह से उलझने को तैयार है बल्कि उसने सोना और उसकी माँ को भी अपनी तरफ कर लिया है। पर अब वह करे क्या उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। हतप्रभ सा कमरे के अंदर आ गया। उसने ध्यान से देखा तो पाया कि सोना के कपड़े और सामान सब नहीं थे। जब उसने खुले पड़े बक्से को ध्यान से उलट पलट कर देखा तो उसके जोड़े हुए तीस हजार रुपये, माया के सभी गहने आदि भी गायब थे। वह नन्हे के कमरे के बाहर आकर बोला,’सोना ये सामान, गहने, मेरे सारे पैसे..ये सब क्यों…?’ सोना के साथ नन्हे बाहर आकर धमकाते हुए बोला, ‘ कैसे पैसे, कैसे गहने ? यहाँ से गया या नहीं..ये तो सोना के ही थे.. या बुलाऊं पुलिस को..अब तुझपे दहेज और मारपीट का केस भी करूँगा।’ फिर थोड़ा ठंडे स्वर में बोला, ‘देख भाई तू अपनी जिंदगी में शांति से रह। अपनी जनानी को बुला ले गाँव से।’ सोना का हाथ हाथ में लेकर उसने रमेश को जैसे अंतिम चेतावनी दी, ‘भाई सोना अब मेरे साथ रहेगी मेरी लुगाई बनकर और मेरे मुन्ने की माँ बनकर। मेरे खुशहाल परिवार में दखल न दे। तू भी माया के साथ खुशी खुशी रह।..हाँ तेरी खुशी के लिये मैं कुछ दिन में ही यहाँ से कहीं और किराये पर चला जाऊंगा। इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता मैं। पुलिस, थाना, कचहरी करनी है तो बता…पर फंसेगा तू ही बताये देता हूँ।’ रमेश बिल्कुल ठगा हुआ सा मुंह लटकाये वहाँ से चला आया।
चाल में यह बात सबको पता चल ही चुकी थी। पर किसी के घरेलू मामले में कौन सर घुसाये यही सोच सब चुप थे। हालांकि सभी को रमेश से सहानुभूति थी। जैसा कि अक्सर ऐसे मामले में आगे बढ़कर दखल देने का साहस शुरू में औरतें ही दिखाती हैं, इस मामले में भी उन औरतों ने जो मासूम माया के साथ हुए व्यवहार को अन्याय मानती थीं आगे आकर रमेश को समझाया। माया की सहेली रेखा बोली, ‘ रमेश ये सब माया की आह का असर है। जो कुछ हुआ वो सबक है तुम्हारे लिये। अभी भी देर नहीं हुई है। पिछले छः महीने तुमने माया की कोई खोज खबर न ली। पर तुम उसे लेने जाओगे तो जरूर आयेगी। इस बेमेल ब्याह का यही हश्र होना था। सोना में माया जैसी समझ नहीं है।’ अधेड़ उम्र की कांता भी समझाते हुए बोली,’ तेरी माँ वैसे भी उसे कोई इज्जत से न रखती होगी। वो तो उससे न जाने क्यों इतना खार खाती है। दुनिया में सबके पास बच्चे नहीं हैं तो क्या वे जीना छोड़ दें। कई लोगों के तो बच्चे उन्हें बुढ़ापे में बेसहारा छोड़ देते हैं।…और रमेश बच्चे न होने की सजा एक औरत को ही क्यों मिलती है? आखिर बच्चे होंगे कि नहीं..होंगे भी तो लड़का होगा कि लड़की.. ये जानना या करना अगर आदमी के बस में नहीं है तो औरत के बस में भी कहाँ है?..पर इंसान के बस में खुश रहना तो है.. लेकिन वो खुश रहना चाहे तो..दुनिया में लाखों अनाथ बच्चे हैं जिन्हें माँ बाप के प्यार की जरूरत है। उनमें से किसी की जिंदगी तू भी तो संवार सकता है।’
यह सब सुनते हुए रमेश की आँखें डबडबा आईं। वह सर झुकाये हुये बोला ‘सही कहती हो कांता भाभी। मुझे मेरे किये का सबक मिला है। मैं कल ही गाँव जाकर माया से माफी माँगूगा। उसे अपने साथ लेकर यहाँ आऊँगा। हम फिर अपनी दुनिया बसायेंगे…पर भाभी क्या वो मुझे माफ कर देगी? क्या वो पिछली बातें भुला पायेगी?’ कांता ने रमेश के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘तू कोशिश तो कर। जहाँ तक मैं माया को जानती हूँ वो जरूर तुझे माफ कर देगी। वह वहाँ आखिर तेरी खुशी के लिए ही तो दुख झेल रही है। औरत का दिल बहुत बड़ा होता है। पर ध्यान रखियो..जिंदगी में दुबारा ये गलती मत करियो। माफी हर बार नहीं मिलती।’
रमेश की आँखों में उम्मीद की चमक साफ दिख रही थी। वह अगले दिन ही माया को लेने गाँव चला गया। इधर नन्हे परिवार समेत कुछ ही दिन में बिना किसी को अपना नया पता बताये चाल से निकल कहीं और रहने के लिये चला गया। इस बात से सब खुश भी थे। चाल अपनी पुरानी रंगत में आ चुका था। नीम पर छाई हरियाली भी देखते ही बनती थी।

-आलोक कुमार मिश्रा