तुम उसका नाम पूछती हो
कभी कभी रोज रोज
और मैं चुप रहता हूं
टाल देता हूं हमेशा हर रोज

लेकिन मैं तुम्हें बताऊंगा
कब?
जब!
जब सावन के बाद बागों में
ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेंगे मोरपंख

जब रंग और फूल में समझौता होगा
अबसे हम अलग अलग रहेंगे

जब तारे आसमान से दूर हो जायेंगे
हमेशा हमेशा के लिए

जब दुनिया भर की
संवेदनशीलता मर जायेगी

तो मैं मान लूंगा
तुम्हें बताने का वक्त है

जब मैं तुम्हें बताऊंगा
तो तुम भी चुप हो जाओगी
जैसे मई महीने में आंधी आती है
और फिर सब शांत हो जाता है

आंखें नीचे किये
तुम पैर के नाखूनों से
मिट्टी कुरेदते हुए
चुप्पी तोड़ते हुए कहोगी

तुमने बहुत देर कर दी

तुम उस वक्त शायद
कुछ बंधनों से जकड़ी रहोगी

अच्छा तुम यह तो नहीं कहोगी
पहले क्यूं नहीं बताया आखिर

-राग रामेश्वर