पल दो पल की यादों में जब
वो मंजर समां रखा था
क्या कहें हम वो आलम
कितना दर्दनाक था
रह रह कर तेरी वीरान सी वो गलियां
मुझे मेरे आंगन से सूनी प्रतीत होती थी
हम न बसेरा कर पाए
तेरे गम की महफिल में
लेकिन तेरी यादों की घड़ी मुझे
आज भी तन्हा करती थी
कैसे समझाए हम खुद को
वक्त की ये चाल
जो बीते वर्ष की तरह मुझे
रुसवाइयों मे खलती थी

प्रगति गुप्ता