दबाओगे मुझे,
रोकोगे मुझे मेरी बात को रखने से,
क्योंकि तुम्हारी बात कह दी है मैंने।
कही तो बात मैंने अपनी,
पर बात थी तुम्हारी।
डर गए हो तुम,
सोच कर,
की कैसे?
कैसे लिखता हूँ मैं तुम्हारी बात को,
बिना पूछे तुमसे।

तुम्हारी हरेक हलचल को,
अपने शब्दों से कह देता हूँ मैं कैसे…?
फिर,
असामाजिक कहोगे मुझे।
करके प्रयत्न अनेकों,
रोकने की जुगत भिड़ाओगे,
मेरी हरेक प्यारी चीज़ को,
कोशिश करोगे छिनने की,
मुझसे दूर करने की,
मुझसे अलग करने की
गर हुए न मेरे अपने,
प्रभावित तुमसे,
गर डरे न मेरे अपने,
तुम्हारे डर से
मार डालोगे मुझे।

मार डालोगे मुझे ही,
अब ये कह कर डराओगे,
कामयाब हो जाओगे फिर,
अपने मनसूबे में तुम।
अब,
अब मुझे भी डरना पड़ेगा,
अपने खातिर ना सही,
अपनों की खातिर,
मरना पड़ेगा मुझे ही।

कुछ न कहूँगा,
कुछ भी ना लिखुंगा,
तर्क-वितर्क कुछ भी ना करूँगा,
शिथिल हो जाऊंगा,
शांत हो जाऊँगा,
मर जाऊंगा।

लवलेश वर्मा