तुम आयी जीवन दोपहरी
को जैसे मधु-निशा मिल गयी

मानचित्र पर नज़र गढाये
ध्रुवतारे से आस लगाये
टूटा हुआ कुतुबनुमा भी
कैसे कोई राह दिखाये
सागर के प्रश्नों से लड़ते
उस क्रिस्टोफर कोलम्बस को
जैसे उत्तर दिशा मिल गयी
तुम आयी जीवन दोपहरी
को जैसे मधु-निशा मिल गयी

हर चेहरे में रंग दिखते थे
हर पहरे में रंग दिखते थे
पहले तो कोहरा दिखता था
फिर कोहरे में रंग दिखते थे
दुनिया रंगने को आतुर उस
लियोनार्डो द विन्ची को
जैसे मोनालिसा मिल गयी
तुम आयी जीवन दोपहरी
को जैसे मधु-निशा मिल गयी

रचित दीक्षित