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II अपनी भाषा , अपना मंच II

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मुक्तक

खनक के शोर में खुद का कभी सानी नहीं बेचा सुरों की चाशनी में लफ्ज़ का मानी नहीं बेचा कठिन इस दौर में जब गर्व का कारण ही बिकना हो वहां हमने अभी तक आँख का पानी नहीं बेचा –… Continue Reading →

आँखों में मशाल

अपनी बेटी को सिखा रहा हूँ आँख मारना जिससे वो एक झटके में ही ध्वस्त कर दे उसे घेरने वाली मर्दवादी किलेबंदी उसे सिखा रहा हूँ आँखें मटकाना कि वो देख सके तीन सौ साठ डिग्री और भेद सके चक्रव्यूह… Continue Reading →

ग़ज़ल

ऐसी भी क्या उड़ी है ख़बर देख कर मुझे सब फेरने लगे हैं नज़र देख कर मुझे क्यों छट नहीं रहा है सियह रात का धुआँ क्यों मुंह छुपा रही है सहर देख कर मुझे दोनों ही रो पड़े हैं… Continue Reading →

एक मुस्कान

ये हवा ये गुलाबी मौसम सब बेमानी है तेरी एक मुस्कान से ये सुर्ख गुलाब ये तंज़ फ़िज़ा सब बेमानी है तेरी एक मुस्कान से खता हो जो बात झूठ कहूँ सिरफिरा हूँ अब तलक बेमान नही ना करूँ तेरे… Continue Reading →

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