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II अपनी भाषा , अपना मंच II

हुनर

बात ये नहीं कि मुझे पर नहीं हैंअसल में उड़ पाने का हुनर नहीं है।। तुम्हें मलाल ये कि मंज़िल नहीं मिलीहमें तो लौट आने को घर नहीं है। गम, आँसू, अज़ाब और ख़्वाब भी हैंलिखने को महज़ गज़ल भर… Continue Reading →

सीरत

सोहबत व सीरत अच्छी, फितरत बेईमान क्यों हैंचेहरा तो है पहचाना, फिर नज़र अनजान क्यों हैं मुक़र्रर है हश्र-ए-ज़मी, हर किसी को तो फिरकहते आदम को, यहाँ मेहमान क्यों हैं गुनहगार ज़ाहिल हैं, इसमे दो राय नहींमसला है, सियासत इन… Continue Reading →

एक खोया सा शहर

उस शहर में कभी जाना होता है तुम्हारा? जहां कई इमारतों की खिड़कियों से हर रोज़ झांकती हैं दबी कुचली ख़्वाहिशें जिस शहर के रास्तों ने होते देखे हैं ढेरों हादसे और फिर दम तोड़ती आवाज़ें जहां सारे मौसम उन… Continue Reading →

आकाश से धरा पर

तुम उतर आए मोहन आकाश से धरा पर मन प्रज्वलित हो उठा अंधेरो को हरा कर रास से युद्ध रण तक माधुर्य से कर्म प्रण तक तुम लाए गीता को स्वर्ण सा खरा कर तुम उतर आए मोहन आकाश से… Continue Reading →

खुला आसमान

दोस्ती महज़ रिश्ता ही नहीं, फ़र्ज़ है यारों का खुदा करे शहर मेरे, ऐसी सरकारें ना हो । गिले शिकवे तो तजुरबे हैं ज़िंदगी के, ठोकर चाहे रास्ते लगे या लगे घर की चौखट में खुदा करे कभी इन रिश्तों… Continue Reading →

आदमी

आदमी के फ़लसफ़े को जी रहा है आदमी आदमी को देखकर यह सोचता है आदमी इक शिकन माथे पे आयी और माथा हिल गया गर जिया है इस तरह तो क्या जिया है आदमी इक ग़ज़ल किसने कही है आदमी… Continue Reading →

वो नाम

रात बैचनी से उठ गया एक कविता लिखी बिना सुर, बिना लय बिना किसी खूबसूरती के कोई अर्थ नहीं था उसमें सोचा फाड़ दूं पन्ने को फिर सीने लगाकर सो गया एक नाम था उसमें सुबह कविता गायब हो गई… Continue Reading →

मेरा जहां

बदन में कुछ शरारे हैं, रहेंगे तसव्वुर में सितारे हैं , रहेंगे रहेगी पांव में आवारगी भी जो घर हमने संवारे हैं, रहेंगे यहां से आसमां अच्छा लगा था ये जंगल भी हमारे हैं, रहेंगे मेरे असबाब कमरे से निकालो… Continue Reading →

इंतजार

मैंने देखा है उस तस्वीर को धुआं बनते हुए जो बनाई थी मैंने हर उस किनारे पर जहां जहां तुम्हारे होने के वहम पाले थे। पर मैं बैठ जाऊं कहीं किसी तन्हा पेड़ की छांव में या थम जाऊं ज़िन्दगी… Continue Reading →

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