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II अपनी भाषा , अपना मंच II

खुला आसमान

दोस्ती महज़ रिश्ता ही नहीं, फ़र्ज़ है यारों का खुदा करे शहर मेरे, ऐसी सरकारें ना हो । गिले शिकवे तो तजुरबे हैं ज़िंदगी के, ठोकर चाहे रास्ते लगे या लगे घर की चौखट में खुदा करे कभी इन रिश्तों… Continue Reading →

आदमी

आदमी के फ़लसफ़े को जी रहा है आदमी आदमी को देखकर यह सोचता है आदमी इक शिकन माथे पे आयी और माथा हिल गया गर जिया है इस तरह तो क्या जिया है आदमी इक ग़ज़ल किसने कही है आदमी… Continue Reading →

वो नाम

रात बैचनी से उठ गया एक कविता लिखी बिना सुर, बिना लय बिना किसी खूबसूरती के कोई अर्थ नहीं था उसमें सोचा फाड़ दूं पन्ने को फिर सीने लगाकर सो गया एक नाम था उसमें सुबह कविता गायब हो गई… Continue Reading →

मेरा जहां

बदन में कुछ शरारे हैं, रहेंगे तसव्वुर में सितारे हैं , रहेंगे रहेगी पांव में आवारगी भी जो घर हमने संवारे हैं, रहेंगे यहां से आसमां अच्छा लगा था ये जंगल भी हमारे हैं, रहेंगे मेरे असबाब कमरे से निकालो… Continue Reading →

इंतजार

मैंने देखा है उस तस्वीर को धुआं बनते हुए जो बनाई थी मैंने हर उस किनारे पर जहां जहां तुम्हारे होने के वहम पाले थे। पर मैं बैठ जाऊं कहीं किसी तन्हा पेड़ की छांव में या थम जाऊं ज़िन्दगी… Continue Reading →

बचपन की यादें

बहुत दिनों की बात पुरानी याद आई सच के जैसी एक कहानी याद आई मां के साए भात की ख़ुशबू वाली शाम सौ – सौ किस्सों वाली नानी याद आई जंगल के बैताल, गुफा के आदमखोर परियों की आंखें नूरानी… Continue Reading →

बूंद

ये बूंदे कुछ-कुछ तुम जैसी हैं थोड़ी बावली तो थोड़ी मस्तानी सी कुछ सुकून तो कुछ बेचैनी भरी इस मुक्कमल से शहर में अधूरी सी हर कमी में थोड़ी-थोड़ी पूरी सी ये बूंदे कुछ-कुछ तुम जैसी हैं -चारू पांडेय

जीवन सत्य

एक शोर मौन लेता है जब हार मिली हो समर से, दुनिया से भी डरता है जो हुआ उपेक्षित घर से, झरने बन जाती आँखें पीड़ा डाले जब डेरा, हर ओर निशा है दिखती है दूर उदय को सवेरा, हैं… Continue Reading →

ज़िद्दी

बहुत ज़िद्दी हूँ मैं….. किसी किताब के सजिल्द आवरण की तरह…. जो संभाले रहता है,किताब के तमाम पन्नों को… उनके अपने कुल हुस्न के साथ…. किसी भी सूरत में,उन्हें होने नहीं देता बेपर्दा…. मुझे कतई नहीं लगता कि…. मैं मेरा… Continue Reading →

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