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II अपनी भाषा , अपना मंच II

तुम्हारे जाने के बाद

हां, तुम्हारा मुझको जाना खल तो रहा है लेकिन अब किसी को खोने का डर नहीं होता हां, अब शामें बिताने को कोई साथ तो नहीं लेकिन खुद से ज्यादा अब कोई जरूरी भी नहीं होता फिल्में देखने अब अक्सर… Continue Reading →

अजनबी

पहचाने से शहर में कोई अजनबी मिला है मैंने कुछ बातें की है, उसने कुछ सुना है डर रहा हूं फिर से, कहीं गुम न हो जाऊं अजनबियों के बीच फिर से अजनबी न हो जाऊं लोगों से बातें करना… Continue Reading →

इल्जाम

मिली थी मैं तुम से कल मोहल्ले के चौराहे पे बात कल रात की थी गुम सुम बिल्कुल चुपचाप मैं निकाल आई नजरें बचाते हुए इल्म हुआ बरसों पहले न लग जाए इल्जाम कोई लौट आई मैं छुपते छुपाते देखते… Continue Reading →

नाम भी कोई पूछने की चीज़ है

काम पूछ लो,दाम पूछ लो,कहां से लाता हूँ राशन,वो दुकाँ पूछ लो,और कुछ न मिले तो,जबां पूछ लो,मिरे रहने का कुआं पूछ लो,ज़िंदा हूँ अब तक,मुफ़लिसी के बावज़ूद,कौन है मेहरबां पूछ लो,नबर्दे-इश्क़ में हारा जहाँ खुद को,वो गली, गुलिस्ताँ पूछ… Continue Reading →

बाशिंदा

सवाल है, क्या पसंदीदा मुझमें जवाब, मेरा अहं शर्मिंदा मुझमें… बस्ता था मुझमें, वो कबका छोड़ गया रहता है कोई और बाशिन्दा मुझमें.. बंद है, तक़दीर के दरवाजे फिर भी ख्वाइशों का है, इक लम्बा पुलिंदा मुझमें.. यूं तो बे-असर… Continue Reading →

मांझी

हवाओं ने किया तूफान का इशारा है न साथ है मांझी न पास में किनारा है। बस कोई है जिसे अपना कह सकें वो महबूब नहीं, बस जीने का सहारा है। मैं कैद जुगनुओं को क्यों करूँ भला जब मेरी… Continue Reading →

काश

ख़ुद से बचकर निकल गए होते अपने दिन भी बदल गए होते हमको कोई कमी नहीं थी वहां हम अगर सर के बल गए होते ख़ुद से कुछ राबता रहा अपना वरना जड़ से उखड़ गए होते हम भी आवारगी… Continue Reading →

आज़ाद परिंदा

तू दुखी क्यों है? जो दुखी है तो रोती क्यों नहीं? इंसान है, भावनाएं हैं बह जाने दे क्यों समेट रही है खोल बाहों को तू परिंदा है खुद को कैद मत कर उड़ तो सही इस डाल से उस… Continue Reading →

मैं और मेरा मन

कुछ तो कर मेरे माज़ी कुछ तो बना मुझे, डाल दे वहशत में या पागल बना मुझे। बरसों हुए है आंख में ठहरा नही कोई, हो सके तो कोई मीर सा ख़्वाब दिखा मुझे। कितना उदास चेहरा! कितनी बेचैन निगाहें!… Continue Reading →

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